बुधवार, 6 जनवरी 2010

हिंदी में परीक्षा देने वाले छात्रों का भविष्य

अब क्या कहे? हमारी हाल में ही परीक्षाएं हुई थीं । प्रश्न पत्र मूलतः अंग्रेजी में लिखा गया था। उसका अनुवाद हिंदी में किया गया था। अनुवाद के लिए आवश्यक होता है अनुवादक को अनूदित और अनुवादित दोनों ही भाषाओँ का पूरा ज्ञान हो। लेकिन जिन भी महापुरुष ने उस प्रश्न पत्र को अनुवादित किया था उन्हें हिंदी का तो ज्ञान था लेकिन वो अंग्रेजी का भावार्थ नही समझ पाए। नतीजा हम जैसे तुच्छ और हिंदी में परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों को भुगतना पड़ा। पूरे ३० अंकों का जवाब नही लिख पाए। आधा घंटे पहले परीक्षा पूरी कर खाली बैठे रहे और खुश होते रहे कि आज तो समय से परीक्षा पूरी कर ली ! हमारा दोष केवल इतना था कि हमने अंग्रेजी का प्रश्न पत्र नहीं पढ़ा था । हिंदी के पर्चे में जो निर्देश दिए गये थे उसके अनुसार केवल सत्तर अंकों की ही परीक्षा थी जबकि पूरी परीक्षा १०० अंको की थी । आज के ये हालत तो मात्र नमूना हैं । इसमें कोई शक नही  कि आने वाले दिनों में ऐसे वाकये बढेंगे । तब हिंदी में परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों का क्या भविष्य होगा? या कहें कि कोई भविष्य होगा या नहीं? इसकी भी कोई "गारेंटी" नही है । पहले तो मात्र एक ही परीक्षा देकर  बाहर निकले विद्यार्थियों में "हिंदी अंग्रेजी का फासला बना ।" फिर उन्हें नौकरी देने वालों ने उनसे "हिंदी अंग्रेजी का भेद भाव किया।" अब तो अपनी भाषा में परीक्षा देना ही गुनाह हो गया है। क्योंकि परीक्षा के प्रश्न पत्रों में हिंदी अंग्रजी से अनुवादित हो रही है। और हिंदी में परीक्षा देने वाले विद्यार्थिओं का भविष्य अपनी योग्यता पर नहीं, अनुवादक की योग्यता पर टिका है!
वर्तिका