भई एक और बात पता चली अपनी हिन्दी के बारे में। जो लाखो करोड़ों रूपये खर्च करके ह्यूमन डेवेलपमेंट रिपोर्ट बनाई जाती है उसे हिन्दी में प्रकाशित किया ही नही जाता! उस ह्यूमन डेवेलपमेंट रिपोर्ट में सबसे ज्यादा ज़िक्र जिस आम आदमी का होता है, वो आज भी हिन्दी बोलता है ! कितनी आजीब बात हुई न ! लेकिन अपने देश में किसी रिपोर्ट बनने वाले, और उसके नाम पर लाखो करोड़ों रूपये बनाने वालों को ये अजीब नही लगती। क्योंकि वो भी जानते हैं की हमें औपचारिकता पूरी करनी है। कौन सा लोग ये रिपोर्ट- शिपोर्ट पढने हे वाले हैं? और जो पढ़ेंगे भी वो भी अंग्रेजी में गिटर- पिटर कर के अपने को कथित बौद्धिक वर्ग में बनाये रखेंगे। जो भी चर्चा होगी, जो भी न के बराबर समाधान निकलेगा भी वह भी उन लोगों तक नही पहुंच पाएगा जिन्हें इनकी सबसे ज्यादा जरुरत है क्योंकि यह आम धारणा है की हिन्दी बोलने वालों को इतनी अक्ल कहाँ जो इन सब बातों को समझ पायें ! लेकिन जनाब जब तक जानेंगे नहीं तब तक बोलेंगे कैसे ? यों ये लोग चाहते भी यही हैं कि न तो हिंदी भाषी समाज जाने और न बोले। क्योंकि अगर आम आदमी को विकास की बातें और उसकी खामियाँ समझ में आने लगीं तो वो बोलेगा और विरोध करेगा। तब छोटे से अंग्रेजी भाषी समुदाय को इतने बड़े हिंदी भाषी समुदाय पर सामंती शासन चलाना मुश्किल पड़ेगा।
वर्तिका
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beshak aapke manobhawon ka tahedil se swagat karta haun!hamaree anant shubhkaamnaayen!
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